Wednesday, 22 July 2015

यूही निकल गया बचपन

खेलते खेलते तक गया था,
घर आया तो खीर की ख़ुश्बू,
सारे घर को बुला रही थी..
खाए दो चार नीवाले,
सुने दो चार किस्से,
कब नींद आ गई,
सुबह को याद भी ना रहा....

यूही निकल गया बचपन,
निकला फिर कुछ बन ने...
घर छोड़ कर अपना,
रहने लगा सपनो में....
होगी दुनिया इस मुट्ठी में,
यही अरमान था....
लगा कोई ना है मुझसा,
क्या मुकाबला करेगा यह ज़माना मेरा?....

हुआ सामना इस दुनिया से,
है और मेरे जैसे तमाम...
कोशिश में है अपनी जगह बनाने की,
कोशिश में है जीतने की वाहवाही....
मैं कोई अकेला नही,
है इसी दौड़ में सब इंसान...

यूही भागते भागते कभी कोई हमराही मिल गया,
भागम भाग में ही वो भी बिछड़ गया....
रुक कर देखने की फ़ुर्सत नही,
यह सब करके क्या मिल गया?...

बहुत निराश, बहुत तक जाता हू कभी....
लेकिन दौड़ने की यह चाहत ख़तम नही होती....

शायद एक दिन खुदा को ही तरस आ गया,
नींद से उठा तो सपना ख़तम हुआ...
है अभी बाकी वोही बचपन,
यह लंबी दौड़ थी बस एक सपना...
अभी बाकी है कुछ और दिन...
मिट्टी में खेलने के,
बारिश में नहाने के...

स्याही तो सूख ही जाएगी

स्याही की बोतल में,
नामी बाकी है भी की नही??
देखने को कलाम डोबोई,
तो देखा ज़िंदा है कुछ रंग अभी...

लिखने को बेताब है उसकी नोक,
मगर हाथों में साहस क्यों नही..
स्याही तो सूख ही जाएगी,
काग़ज़ पे उतार जाए या बोतल में ही सही...

मेरे जहाँ में दो आसमान है,
धरती भले एक ही सही...
मेरे सीने में अरमान तमाम है,
उसमे दिल धारकता एक ही सही...

मेरी सासों के किनारे.

मैं क्यू जागा करता था,
सारी रात सहलाने को सर तेरा??
मैं क्यू डरता था,
की कही आँख ना लग जाए..

क्यू नींद खुल जाती थी,
तेरी आँख खुलने से पहले??
डर से की शायद तू ये ना समझ लेती,
तक गया था तुझे देखते देखते.

बीच में कभी आँख खुल जाती थी जब तेरी,
पलके अपनी झुका लेता था, ना जाने क्यू.
साँसे तेरी गिनता था जो जड जाती थी,
मेरी सासों के किनारों से.