खेलते खेलते तक गया था,
घर आया तो खीर की ख़ुश्बू,
सारे घर को बुला रही थी..
खाए दो चार नीवाले,
सुने दो चार किस्से,
कब नींद आ गई,
सुबह को याद भी ना रहा....
यूही निकल गया बचपन,
निकला फिर कुछ बन ने...
घर छोड़ कर अपना,
रहने लगा सपनो में....
होगी दुनिया इस मुट्ठी में,
यही अरमान था....
लगा कोई ना है मुझसा,
क्या मुकाबला करेगा यह ज़माना मेरा?....
हुआ सामना इस दुनिया से,
है और मेरे जैसे तमाम...
कोशिश में है अपनी जगह बनाने की,
कोशिश में है जीतने की वाहवाही....
मैं कोई अकेला नही,
है इसी दौड़ में सब इंसान...
यूही भागते भागते कभी कोई हमराही मिल गया,
भागम भाग में ही वो भी बिछड़ गया....
रुक कर देखने की फ़ुर्सत नही,
यह सब करके क्या मिल गया?...
बहुत निराश, बहुत तक जाता हू कभी....
लेकिन दौड़ने की यह चाहत ख़तम नही होती....
शायद एक दिन खुदा को ही तरस आ गया,
नींद से उठा तो सपना ख़तम हुआ...
है अभी बाकी वोही बचपन,
यह लंबी दौड़ थी बस एक सपना...
अभी बाकी है कुछ और दिन...
मिट्टी में खेलने के,
बारिश में नहाने के...
घर आया तो खीर की ख़ुश्बू,
सारे घर को बुला रही थी..
खाए दो चार नीवाले,
सुने दो चार किस्से,
कब नींद आ गई,
सुबह को याद भी ना रहा....
यूही निकल गया बचपन,
निकला फिर कुछ बन ने...
घर छोड़ कर अपना,
रहने लगा सपनो में....
होगी दुनिया इस मुट्ठी में,
यही अरमान था....
लगा कोई ना है मुझसा,
क्या मुकाबला करेगा यह ज़माना मेरा?....
हुआ सामना इस दुनिया से,
है और मेरे जैसे तमाम...
कोशिश में है अपनी जगह बनाने की,
कोशिश में है जीतने की वाहवाही....
मैं कोई अकेला नही,
है इसी दौड़ में सब इंसान...
यूही भागते भागते कभी कोई हमराही मिल गया,
भागम भाग में ही वो भी बिछड़ गया....
रुक कर देखने की फ़ुर्सत नही,
यह सब करके क्या मिल गया?...
बहुत निराश, बहुत तक जाता हू कभी....
लेकिन दौड़ने की यह चाहत ख़तम नही होती....
शायद एक दिन खुदा को ही तरस आ गया,
नींद से उठा तो सपना ख़तम हुआ...
है अभी बाकी वोही बचपन,
यह लंबी दौड़ थी बस एक सपना...
अभी बाकी है कुछ और दिन...
मिट्टी में खेलने के,
बारिश में नहाने के...